एमडीडीए की “तेल बचाओ मुहिम” बनी जिम्मेदार कार्यसंस्कृति की मिसाल। Uttarakhand 24×7 Live news
एमडीडीए की “तेल बचाओ मुहिम” केवल सरकारी औपचारिकता नहीं, बल्कि बदलती कार्यसंस्कृति का संकेत बनकर सामने आई है। आज जब देश ऊर्जा संकट, बढ़ते प्रदूषण और ट्रैफिक दबाव जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब ऐसे छोटे लेकिन प्रभावी कदम समाज को नई दिशा देने का काम करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऊर्जा संरक्षण आह्वान और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सोच को जमीन पर उतारते हुए मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण ने यह साबित किया है कि प्रशासन चाहे तो बदलाव की शुरुआत अपने दफ्तरों से भी कर सकता है।
एमडीडीए उपाध्यक्ष बंशीधर तिवारी द्वारा अधिकारियों और कर्मचारियों को कार पूलिंग अपनाने, अनावश्यक वाहन उपयोग कम करने और साइकिल या पैदल कार्यालय आने के लिए प्रेरित करना एक व्यवहारिक और जिम्मेदार पहल है। इससे न केवल ईंधन की बचत होगी, बल्कि शहर में ट्रैफिक दबाव और प्रदूषण कम करने में भी मदद मिलेगी। “एक अधिकारी, एक वाहन” का संदेश सरकारी व्यवस्था में अनुशासन, जवाबदेही और सामाजिक भागीदारी को भी मजबूत करता है।
ऊर्जा संरक्षण को लेकर एमडीडीए ने केवल वाहनों तक ही खुद को सीमित नहीं रखा। कार्यालयों में एसी का सीमित उपयोग, जरूरत न होने पर लाइट और कंप्यूटर बंद रखने जैसे निर्देश यह दर्शाते हैं कि संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल ही भविष्य की सबसे बड़ी जरूरत है। अक्सर सरकारी दफ्तरों में बिजली और संसाधनों की अनदेखी देखने को मिलती है, लेकिन एमडीडीए की पहल इस सोच को बदलने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।
देहरादून और मसूरी जैसे शहर लगातार बढ़ते ट्रैफिक, ईंधन खपत और पर्यावरणीय दबाव का सामना कर रहे हैं। ऐसे में यदि सरकारी विभाग स्वयं उदाहरण पेश करें तो आम नागरिकों पर भी उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह अभियान केवल “तेल बचाओ” तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, जिम्मेदार नागरिकता और सतत विकास की दिशा में एक मजबूत संदेश देता है।
जरूरत इस बात की है कि एमडीडीए की तरह अन्य विभाग, संस्थान और आम लोग भी अपनी दैनिक आदतों में छोटे-छोटे बदलाव लाएं। क्योंकि सच यही है कि बड़े परिवर्तन हमेशा छोटी शुरुआत से ही जन्म लेते हैं।
