नेपाल में ग्लेशियर टूटने से तबाही, बर्फ-चट्टान के मलबे से नदी में बना अस्थायी बांध टूटने से आया सैलाब। Uttarakhand 24×7 Live news

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नेपाल में ग्लेशियर टूटने के बाद आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। अचानक आए इस सैलाब में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है और कई लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। शुरुआती वैज्ञानिक आकलनों में ग्लेशियर से बर्फ, चट्टान और मलबे के खिसकने के बाद नदी के प्रवाह में अचानक बदलाव को इस आपदा की बड़ी वजह माना जा रहा है।

इस घटना ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों की निगरानी और उनकी बदलती स्थिति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। सवाल ये है कि आखिर नेपाल में तबाही की असल वजह क्या रही और क्या इस तरह की घटनाओं का खतरा भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी है?

इसी को लेकर हमने बात की वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के भू-वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता से।

डॉ. मेहता के मुताबिक नेपाल में जिस ग्लेशियर का हिस्सा टूटा, वह कोई बहुत बड़ा ग्लेशियर नहीं था। इसकी लंबाई करीब ढाई से तीन किलोमीटर के आसपास थी। यह एक हैंगिंग ग्लेशियर था, यानी ऐसा ग्लेशियर जो ऊंचाई पर ढलान वाले क्षेत्र में स्थित होता है और जिसके टूटने की स्थिति में बर्फ और चट्टानों का मलबा तेजी से नीचे की ओर आ सकता है।

वहीं इस पूरे इलाके की भौगोलिक संरचना भी बेहद संवेदनशील है। यहां फ्रोजन अर्थ और पर्माफ्रॉस्ट जैसे क्षेत्र मौजूद हैं। तापमान में बदलाव के कारण इन क्षेत्रों की स्थिरता प्रभावित होने पर चट्टानों, बर्फ और मलबे के खिसकने का खतरा बढ़ सकता है।

सबसे अहम बात ये है कि वैज्ञानिक अब केवल जमीन पर जाकर ग्लेशियरों की निगरानी तक सीमित नहीं हैं। USGS, ISRO और दूसरे सैटेलाइट डेटा के जरिए ग्लेशियरों की स्थिति, उनके आकार में बदलाव और आसपास के भू-भाग की गतिविधियों का लगातार अध्ययन किया जा रहा है।

नेपाल की इस घटना के बाद भारत के हिमालयी क्षेत्रों में भी ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की निगरानी कितनी जरूरी है, इस पर ध्यान बढ़ा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि लगातार मॉनिटरिंग, सैटेलाइट इमेजरी और समय रहते चेतावनी प्रणाली ऐसी घटनाओं के जोखिम को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है।

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